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Thursday, March 14, 2019

प्रहलाद ने बनवाया था नरसिंह भगवान का यह मंदिर

आंध्रपदेश के विशाखापट्टनम में सिंहाचलम नाम का ऐसा मंदिर है जिसमें भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार की पूजा की जाती है। यह मंदिर विश्व के प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर को हिरण्यकश्यप के भगवान नरसिंह के हाथों मारे जाने के बाद प्रहलाद ने बनवाया था। लेकिन वो मंदिर सदियों बाद धरती में समा गया। इसके बाद इस मंदिर को पुरुरवा नाम के राजा ने दोबारा से स्थापित किया था। विशाखापट्टनम से महज 16 किमी दूर सिंहाचल पर्वत पर स्थित है सिंहाचलम मंदिर। 



इस मंदिर भगवान नरसिंह का घर कहा जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह है की यहाँ पर भगवान् विष्णु के वराह और नृसिंह अवतार का सयुंक्त रूप है जो की माँ लक्ष्मी के साथ विराजित है। इसके साथ ही इस मंदिर में भगवान नरसिंह की मूर्ति पर पूरे समय चंदन का लेप ही लगा होता है। दरअसल, जब पुरुरवा ने मंदिर में मूर्ति की स्थापना कि थी तो उसे चंदन के लेप से ढंक दिया था और तभी से यहां इसी तरह पूजा की जाती है, साल में केवल वैशाव मास के तीसरे दिन अक्षय तृतीया पर ये लेप प्रतिमा से हटाया जाता है। इस दिन यहां सबसे बड़ा उत्सव मनाया जाता है।

जानिए श्रीहरि ने क्यों लिया था नरसिंह अवतार?

जब-जब दुनिया में पाप का घडा भरा, तब-तब भगवान ने अवतार लिया। भगवान विष्णु ने सतयुग से लेकर द्वापर युग तक धरती पर पाप का अंत करने के लिए कई अवतार धारण किये थे, उन्हीं अवतारों में से एक अवतार था नरसिंह भगवान का अवतार। लेकिन क्या आपको पता है भगवान विष्णु ने क्यों लिया था नरसिंह अवतार। राक्षसों का राजा था हिरण्यकश्यप, उसको ब्रह्मा जी ने वरदान दिया था कि वो न दिन में मारा जाए न रात में, न अस्त्र से न शस्त्र से, न जमीन पर न आसमान में, न तो इंसान मार सके न तो जानवर उसे मार सके। 

हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से बहुत घृणा करता था उसको श्रीहरि का नाम सुनना भी पसंद नहीं था। उसके राज्य में जो भी कोई श्रीहरि की पूजा करता या फिर उनका नाम भी लेता वह उसको मौत की सजा सुना देता। हिरण्यकश्यप की एक बहन भी थी होलिका, उसे ब्रह्माजी ने वरदान दिया था कि वो आग में कभी नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यप का पुत्र भी था, जिसका नाम प्रहलाद था। प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। राक्षसराज हिरण्यकश्यप प्रहलाद की हरि भक्ति से परेशान था। वह उसे रोज प्रताड़ित करता। 



उसने पहले तो प्रहलाद को डराया धमकाया लेकिन जब भक्त प्रहलाद पर इन बातों का असर नहीं हुआ तो वह प्रहलाद को जान से मारने का प्रयत्न करने लगा। लेकिन भगवान की लीला के सामने वह हर बार असफल हो जाता। एक दिन हिरण्यकश्यप के आदेश पर होलिका प्रहलाद को लेकर आग की चिता पर बैठ गई लेकिन श्रीहरि की कृपा से होलिका जलकर मर गई और प्रहलाद बच गया। यह सब देखकर हिरण्यकश्यप गुस्से से आग बबूला हो गया और भगवान को ललकारते हुए प्रहलाद से पूछा कि कहां है तेरा प्रभु? तब प्रहलाद ने कहा कि भगवान तो सर्वज्ञ हैं। 

यह सुनकर हिरण्यकश्यप और क्रोधित हो गया और क्रोध में उसने कहा क्या इस खंभें में भी तेरा प्रभु है, इस पर प्रहलाद ने कहा कि वो तो हर जगह व्याप्त हैं, इस खंभें में, इन दीवारों में, आपमें-मुझमें, इन सब में, हर जगह श्रीहरि व्याप्त हैं। यह सुनकर हिरण्यकश्यप क्रोधित हो गया और खंभें पर प्रहार कर दिया, देखते-देखते खंभें से नरसिंह भगवान प्रकट हो गए। नरसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यप को अपनी जांघों पर रखकर अपने तेज नाखूनों से उसका पेट फाड़ दिया और उसका वध कर दिया। इस तरह से भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लिया।




Thursday, February 7, 2019

जब माता अनुसूईया ने अपने तप से त्रिदेवों को बना दिया शिशु

महर्षि अत्री की पत्नी सती अनुसूईया अपने पतिव्रता धर्म के कारण हर जगह सुविख्यात थी, उनकी हर जगह मिसालें दी जाती थी। जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वनवास काल में थे तो उस दौरान वह महर्षि अत्रि के आश्रम में ठहरे थे जहां सीता माता ने उनसे पतिव्रता धर्म की शिक्षा ली थी। लेकिन माता अनुसूईया की पतिव्रता भक्ति से तीनों देवियां उस समय विचलित हो गई जब उन्हें नारद जी द्वारा पता चला कि माता अनुसूईया ही सबसे पतिव्रता स्त्री हैं और उस दिन उन्होंने माता अनुसूईया की परीक्षा लेने की ठान ली। दरअसल, एक दिन लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सरस्वती जी अपने पतिव्रता होने की एक-दूसरे से चर्चा कर रही थी। तभी वहां नारद जी तीनों देवियों के पास जा पहुंचे और माता अनुसूईया के पतिव्रता धर्म का गुणगान करने लगे। लेकिन त्रिदेवियों को यह प्रशंसा बहुत चुभ गई। 

तभी ब्रह्मा, विष्णु और शिव वहां पहुंचे गए जहां तीनों देवियां आपस में बात कर रही थी। तीनों देवियों ने त्रिदेवों से माता अनुसूईया की परीक्षा लेने की जिद्द की। तीनों देवों ने उन्हें बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी और बहुत आग्रह करने पर तीनों देव वहां से ऋषियों का वेष धारण कर महर्षि अत्री के आश्रम पहुंच गए। अतिथि-सत्कार की परंपरा के चलते सती अनुसूईया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत किया और खाने के लिए आमंत्रित किया। लेकिन ऋषियों के भेष में त्रिमूर्तियों ने एक स्वर में कहा कि हे साध्वी, हमारा एक नियम है कि जब तुम निर्वस्त्र होकर भोजन परोसोगी, तभी हम भोजन करेंगे। ऋषियों की यह बात सुनकर माता अनुसूईया अस मंजस में पड़ गई और सोचने लगी कि अगर ऐसा किया तो उनका पतिव्रता धर्म खंडित हो जाएगा। उन्होंने मन ही मन ऋषि अत्रि का स्मरण किया और अपनी दिव्य शक्ति से जाना कि यह तो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। 



मुस्कुराते हुए माता अनुसूईया बोली 'जैसी आपकी इच्छा'.... माता ने तीनों यतियों पर जल छिड़का और उन्हें शिशुयों में परिवर्तित कर दिया। सुंदर शिशु देख कर माता अनुसूईया के हृदय में मातृत्व भाव उमड़ पड़ा। इसके बाद माता ने शिशुओं को स्तनपान कराया, दूध-भात खिलाया, गोद में सुलाया। तीनों गहरी नींद में सो गए। त्रिदेवों को झूले में झुलाते हुए माता अनुसूईया माता ने कहा- ‘तीनों लोकों पर शासन करने वाले त्रिमूर्ति मेरे शिशु बन गए, मेरे भाग्य को क्या कहा जाए। फिर वह मधुर कंठ से लोरी गाने लगी। उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा और द्वार के सम्मुख खड़ा हो गया। फिर, एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम के ऊपर से उड़ने लगा। एक राजहंस विकसित कमल को चोंच में लिए हुए आश्रम में उतर आया। उसी समय महती वीणा पर नीलांबरी राग का आलाप करते हुए नारद जी और उनके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंची। 

नारद ने विनयपूर्वक अनुसूईया से कहा कि माता ये तीनों अपने पतियों को ढूंढ रही हैं, कृपया आप इनके पतियों को लौटा दीजिये। अनुसूईया ने तीनों देवियों को प्रणाम किया और कहा- माताओं, झूलों में सोने वाले शिशु अगर आपके पति हैं तो इन्हें आप ले जा सकती हैं। जब त्रिदेवियों ने तीनों शिशु को देखा तो वे तीनों उन्हें एक समान ही लगे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती भ्रमित होने लगीं। तीनों की असमंजस को देखकर नारद जी ने उनसे पूछा कि क्या आप अपने पति को पहचान नहीं सकतीं? जल्दी से अपने-अपने पति को गोद में उठा लीजिए। जल्दी-जल्दी में देवियों ने एक-एक शिशु को गोदी में उठा लिया। 

शिशुओं को गोदी में उठाते ही तीनों के तीनों त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें पता चला कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियों ने माता अनुसूईया से क्षमा मांगी और उन्हें पूरा सच बताया। उन्होंने प्रार्थना की कि उनके पति को दोबारा उनके स्वरूप में ले आए। तब माता अनुसूईया ने त्रिदेवों को उनका रूप प्रदान किया। अनुसूईया की मातृ भक्ति से खुश होकर तीनों देवों ने माता से वरदान मांगने को कहा। तब माता ने बोला कि आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें ये वरदान चाहिए अन्यथा नहीं। तभी से मां सती अनुसूईया के नाम से प्रख्यात हुई तथा कालान्तर में भगवान दतात्रेय रूप में भगवान विष्णु का, चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म माता अनुसूया के गर्भ से हुआ।