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Friday, February 15, 2019

जया एकादशी के व्रत से माल्यवान और पुष्पवती को मिल थी मुक्ति

जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और व्रत करने वाले हर जातक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही व्यक्ति सभी नीच योनि अर्थात भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है और उसमें कभी जन्‍म नहीं लेता है। जया एकादशी से जुड़ी हुई बहुत सारी कथाएं प्रचलित हैं, उनमें से यह एक है। प्राचीन समय में देवराज इंद्र का स्वर्ग में राज था। स्वर्ग में देवराज इंद्र और अन्य देवगण सुखपूर्वक रहते थे। एक दिन नंदन वन में उत्सव चल रहा था और इंद्र अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे। इस दौरान गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत और उसकी कन्या पुष्पवती, चित्रसेन और उसकी स्त्री मालिनी भी उपस्थित थे। साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी वहां उपस्थित थे। उस समय गंधर्व गाना गा रहे थे और कन्याएं नृत्य प्रस्तुत कर रही थी। इसी बीच पुष्पवती की नजर माल्यवान पर पड़ी और वह उस पर मोहित हो गई। 



पुष्पवती अपने नृत्य से माल्यवान पर काम-बाण चलाने लगी। पुष्पवती सभा की मर्यादा भूलकर ऐसा नृत्य करने लगी कि माल्यवान उसकी ओर आकर्षित हो गया। माल्यवान, पुष्पवती को देखकर सुध-बुध खो बैठा और अपने गाने से भटक कर सुर-ताल छोड़ दिए। यह देखकर इंद्र देव को क्रोध आ गया और दोनों को श्राप दे दिया। देवराज इंद्र के श्राप देते ही दोनों ही पिशाच बन गए और हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष पर दोनों का निवास बन गया। उन दोनों को उस पिशाच योनि में काफी दुख भोगना पड़ रहा था। तब माघ मास में शुक्ल पक्ष की जया एकादशी आई। उस दिन दोनों ने वह व्रत किया और केवल फलाहार पर ही अपना दिन व्यतीत किया। उस दिन भी दोनों बहुत दुखी थे और सायंकाल के समय पीपल के वृक्ष के नीचे बैठे थे। लेकिन तभी अचानक उनकी मृत्यु हो गई और जया एकादशी का व्रत करने से दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई। इसके बाद माल्यवान और पुष्पवती पहले की तरह सुंदर हो गए और उन दोनों को स्वर्ग लोक में वापस स्थान मिल गया। 

कष्ट से मुक्ति पाने के लिए जया एकादशी पर करें भगवान विष्णु की पूजा

आज जया एकादशी है, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से कई गुना पुण्य की प्राप्ति होती और जातक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी मनाई जाती है, हिन्दू धर्म इस एकादशी का बहुत खास महत्व है। यही नहीं यह व्रत करने से व्यक्ति सभी नीच योनि अर्थात भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है और उसमें कभी जन्‍म नहीं लेता है। 


जया एकादशी का व्रत करने से घर की नेगेटिव एनर्जी दूर होती है और परिवारजनों का स्वास्थ्य भी सही रहता है। इस एकादशी को करने से ब्रह्महत्या जैसे पापों से मुक्ति मिलती है। एकादशी के दिन सुबह जल्‍दी उठना चाहिए। नित्‍य कर्मों से निवृत्‍त होकर श्री विष्णु जी ध्यान करें। व्रत का संकल्प लें. फिर धूप, दीप, चंदन, फल, तिल, एवं पंचामृत से उनकी पूजा करें। व्रत रखने वाले को इस दिन भोजन में केवल सात्विक भोजन करना चाहिए। 

Wednesday, February 13, 2019

आप भी पढ़िये श्रीहरि ने मोहिनी अवतार में कैसे दिखाई थी लीला

जब भी धरती पर पाप बड़ा तब-तब भगवान विष्णु ने अलग-अलग रूपों में अवतार लिया और धरती की रक्षा की। श्रीहरि का एक रूप ऐसा भी था जिसने हर किसी को मोह लिया था, और वो था मोहिनी अवतार। श्रीहरि ने अपना यह अवतार कई बार लिया था। लेकिन धर्मग्रंथों में दी गई जानकारी के मुताबिक, भगवान विष्णु ने तीन बार मोहिनी अवतार लिया था। सबसे पहले श्रीहरि ने अपना मोहिनी अवतार समुद्रमंथन के दौरान लिया था। तब अपने मोहिनी अवतार के रूप में श्रीहरि ने दैत्यों को इतना मोहित किया था कि अमृत के पीछे न भागते हुए मोहिनी के हाथों ही अमृत पीने की इच्छा जाहिर करने लगे थे। लेकिन मोहिनी अवतार में श्रीहरि ने देवों को अमृत और दानवों को सामान्य जल पिलाया था। दूसरी बार श्रीहरि ने मोहिनी अवतार लिया था भस्मासुर का वध करने के लिए। 



जब भस्मासुर को भगवान शिव ने वरदान दिया कि वह किसी पर भी हाथ रखे वो भस्म हो जाएगा। तब कुछ दिनों बाद वह देवी पार्वती पर ही मोहित हो गया और भगवान शिव पर हाथ रखने की कोशिश करने लगा। तब श्रीहरि ने मोहिनी अवतार लिया और भस्मासुर के समक्ष नृत्य करने की शर्त रखी और इस तरह नृत्य करते समय ही उसका हाथ उसी के सिर पर रखवा दिया। इस तरह भस्मासुर का अंत हुआ। और तीसरी बार भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप द्वापरयुग में लिया था। अर्जुन के बेटे इरावन ने अपने पिता की जीत के लिए खुद की बलि देने का मन बनाया। बलि देने से पहले उसकी अंतिम इच्छा थी कि वह मरने से पहले शादी करना चाहता था। मगर इस शादी के लिए कोई भी लड़की तैयार नहीं थी क्योंकि शादी के तुरंत बाद उसके पति को मर जाना था। तब श्रीहरि ने मोहिनी का रूप लिया और इरावन से न केवल शादी की बल्कि एक पत्नी की तरह उसे विदा करते हुए बहुत रोए।