Tuesday, June 11, 2019

श्रीमद्भगवद्‌गीता


यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
भावार्थ : परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं हैII



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ॐ नमो हनुमते रुद्रावतारायविश्वरूपाय अमित विक्रमायप्रकटपराक्रमाय महाबलायसूर्य कोटिसमप्रभाय रामदूताय स्वाहा !!
इस विशेष मंत्र के जाप के समय कुछ विशेष बातो का ध्यान रखने की अत्यन्त आवश्यकता है अन्यथा यह अपना प्रभाव नहीं दिखाती. नित्य दैनिक क्रिया व स्नान आदि से निर्मित होनेके बाद हनुमाज जी की पंचोपचार के साथ पूजा करनी चाहिए

Wednesday, June 5, 2019

कबीर दास जी के दोहे



बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
अर्थ: यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।

Monday, June 3, 2019

वट सावित्री व्रत


यह व्रत ज्येष्ठ भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को रखा जाता है। इस व्रत में सत्यवान सावित्री की कथा कही जाती है साथ ही सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार बरगद वृक्ष के नीचे बैठकर गौरा-पार्वती को साक्षी रखकर सुहागन स्त्रियां अपने वैवाहिक जीवन के चिरायु होने, पति के उत्तम स्वास्थ व आरोग्य की मंगल कामना करती है।
   सनातन धर्म में पौराणिक कथाओं के माध्यम से वृक्षों को आम जन-जीवन से व्रतों के साथ जोड़ दिया गया है, और व्रतों को महिलाओं से।
महिलाएं अपने परिवार पति व बच्चों से अगाध प्रेम होने के कारण न केवल परिवार, समाज वरन् प्रकृति के संरक्षण का दायित्व भी बखूबी निभाना जानती हैं।
 जितने गहरे और फैलाव में बरगद की जड़ें मजबूत होती जाती हैं ऐसे ही सबका दाम्पत्य जीवन रहे।
जय माता सावित्री


आदिगुरू श्री शंकराचार्य द्वारा रचित यह शिवस्तव वेद वर्णित शिव की स्तुति प्रस्तुत करता है। शिव के रचयिता, पालनकर्ता एव विलयकर्ता विश्वरूप का वर्णन करता यह स्तुति संकलन करने योग्य है।
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं
गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं
महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम्
(हे शिव आप) जो प्राणिमात्र के स्वामी एवं रक्षक हैं, पाप का नाश करने वाले परमेश्वर हैं, गजराज का चर्म धारण करने वाले हैं, श्रेष्ठ एवं वरण करने योग्य हैं, जिनकी जटाजूट में गंगा जी खेलती हैं, उन एक मात्र महादेव को बारम्बार स्मरण करता हूँ|
महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं
विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं
सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्
हे महेश्वर, सुरेश्वर, देवों (के भी) दु:खों का नाश करने वाले विभुं विश्वनाथ (आप) विभुति धारण करने वाले हैं, सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि आपके तीन नेत्र के सामान हैं। ऎसे सदा आनन्द प्रदान करने वाले पञ्चमुख वाले महादेव मैं आपकी स्तुति करता हूँ।


कबीर दास जी


जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
अर्थ: जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते  हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।